मजदूर दिवस: विडंबना!

आज मजदूर दिवस है…बधाई और शुभकामना की खूब होड़ मची है सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर, पर हम बधाई या शुभकामना नहीं देंगे,,,क्योंकि मैं यथार्थ में एक रिक्शे खींचने वाले बूढ़े, शारिरिक रूप से अक्षम और व्यथित व्यक्ति के प्रति कोई अनुराग नहीं रखता, मैं मजदूर को चंद पैसे पर चंद क्षण के लिए खरीदा गया गुलाम समझता हूं इसीलिए एक विशेष दिन उन्हें कोई प्रतीकात्मक सम्मान देकर उनके दिलों में उम्मीद के दीप नहीं जलाएंगे!

इस जगत में चलन है कि जब कोई प्राणी या वस्तु दुर्लभ या अत्यधिक शोषण के तरफ उन्मुख होते हैं तो उसके सम्मान में उसकी प्रतिष्ठा और वस्तुस्थिति को सुधारने के लिए राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष दिन घोषित कर दिया जाता है जो आजकल उस दिन उस विचार करने के बजाय सिर्फ एक राजनीतिक ढकोसला बनकर रह गया है,,,तो ऐसे में प्रतीकात्मकता एक मजदूर को उसके परिस्थितियों से उबारने में सहाय कैसे हो सकती है,

मजदूर किसी भी राष्ट्र का एक थाती होता है जिसका शोषण औपनिवेशिक काल में अपने चरम पर था तभी कार्लमार्क्स ने मजदूरों को जाती क्षेत्र से ऊपर उठकर एक होने को कहा, उसने कहा कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, मार्क्स ने बताया कि पूंजीपति वर्ग को जो अतिरिक्त लाभ है वह मजदूरों के शोषण से ही सम्भव है,

…और दुर्भाग्य यह शोषण दिन ब दिन गहराता ही जा रहा है,

इंसान के मानवीय संवेदनशीलता के क्षरण ने बहुत हद तक असंवेदनशील बनाया है जिस कारण आज हम किसी भी शोषित गरीब या मजदूर या मजलूम के प्रति सहर्ष भाव नहीं अभिव्यक्त करते जिससे मानवीय श्रृंखला को बहुत आघात पहुंचा है,

मजदूर दिवस पर एक संदेश और संकल्प यह लिया जा सकता है कि कहीं उनके श्रम का शोषण होने से बचाया जाए, उनके श्रम के अनुरूप उन्हें तंखावह दिया जाए, अतिरिक्त श्रम का बेहतर वेतन दिया जाए, और उनके हालात पर सामंती सोच के कोड़े ना मारे जाएं!

Suresh Rai Chunni

हां मैं गंवार हूँ!

हां मैं गंवार हूँ

गंवार शब्द के अर्थ की तलाश है, और अर्थ भी वही जो व्यहारिकता पर खरे उतरे,,

अक्सर राह चलते हुए किसी हाई फाई सुटधारक द्वारा गुजर रहे लोकल भाषा में बात करने वाले को गंवार कह कर पुकारते हैं,, सूट धारक के हांथो में सिगरेट होता है पर वह किसी रिक्शे वाले को बीड़ी पीता देख उसे गंवार शब्द से विभूषित करता है, एक कम पढ़ा लिखा व्यक्ति अगर थोड़ा माइकल जैक्सन वाला स्टाइल मारते हुए अंग्रेजी में बात करे और सिगरेट के धुओं का छल्ला बनाकर आसमान में उड़ाए,,,तो वाह क्या बात है,,,looking so hot, professional,,,

पर वहीं भारतीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए अपने मातृ भाषा में ही हृदय स्पर्शी लब्ज बोल रहा हो जो कि अक्षरसः अनुपालन योग्य है तो वह गंवार की श्रेणी में आता है आखिर ऐसा क्यों?

आप मुझे गंवार ही कहो न मुझे गुमान है अपने गँवारापन पर कम से कम मैं सड़क पर ट्रैफिक नियम से लेकर संसद तक अपने कानून और संविधान का खुलेआम धज्जियां तो नहीं उड़ाता,,

एक महंगी कार से उतरा हुआ व्यक्ति जो मानसिक रूप से बेहद कमजोर है, समाज में एक अभिशाप भी हो सकता है किंतु वह वंदनीय हो जाता है जबकि एक पढ़ा लिखा सादगी से जीवन जीने वाला अध्यापक एक समय के बाद अपने ही समाज में उपेक्षित हो जाता है क्या सिर्फ इसलिए कि वह जीवन भर समाज को नैतिकता का पाठ पढ़ाते आया है जिसने सदैव सर्जनात्मक और रचनात्मक बात की इसीलिए?

शायद हम किसी दूषित शक्ति के प्रभाव में हैं,,, या तो सामंती सोच हो सकती है या फिर औपनिवेशिक जंजीर या फिर आधुनिकता की अंधी दौड़, जिसमें हम अपनी मौलिकता खोते हुए आगे बढ़ने को आधुनिकता से जोड़ कर देख रहे हैं,

हिंदी और भोजपुरी तथा अपने स्थानीय भाषा में बात करना क्या गँवारापन है? अगर हां तो हम जैसों को गंवार कहलाने में फक्र महसूस होगा,

क्या अंग्रेजी के दो बोल आ जाने से इंटलैक्चुअलिटी की परिभाषा पूरी हो जाती है, तो शायद जिसने भी यह रेखा खींची वह संकीर्ण मानसिकता का पोषक है,

वह मानसिक रूप से गुलाम माना जा सकता है जो कि सर्वप्रथम मौलिकता को नजरअंदाज कर रहा होता है जिससे कभी भी व्यकितगत प्रतिभा निखर कर विश्व के रंग मंच पर मंचन नहीं कर सकता,,,

हां मैं गंवार हूँ क्योंकि मैं तहजीब में रहता हूँ,

सलीके से जीता हूँ

सादगी से मिलता हूँ और अपनी संस्कृतियों और सभ्यताओं में विश्वास रखता हूँ

हां मैं गंवार हूँ,,,,

Suresh Rai Chunni

the legend of development: manoj sinha!

आज मैं पूर्वांचल के राजनितिक एवं सामाजिक अभिभावक आदरणीय #मनोज_सिन्हा जी के संदर्भ में एक प्रस्तुतिकरण लेकर प्रस्तुत हुआ हूं,
आग्रह है, गुजारिश है कि आज वर्तमान के भागम भाग भरे जिंदगी से 10mint का वक्त निकाल कर मुझे अनुग्रहित करें, इसके बदले मैं कोशिश करूंगा कि एक ऐसा यक्ष प्रश्न आप लोगों के दिलों-दिमाग पर छोड़ जाऊं जो आपको गहन एवं गंभीर चिंतन करने पर बाध्य कर दे,

व्यक्तिगत तौर पर मेरा राजनीति में कभी भी स्वैक्षिक रूचि नहीं रही, पर मेरा मानना है कि हम रूचि रखें या ना रखें राजनीति, समाज का एक घटक होने के नाते हम सब में रूचि रखती है और ज़ब से लोकतांत्रिक प्रणाली के द्वारा मतदान की शुरुआत हुई तब से राजनीति प्रत्यक्ष रूप से हमको और आपको हर कदम पर प्रभावित करती ही रहती है.

ऐसे में यही राजनीति यदि नैतिक मूल्यों और मानवीयता को अहमियत देने वाले के हाँथ में चली जाए तो समाज का बच्चा-बच्चा संवेदनशील और नैतिक होगा अन्यथा हमने मध्ययुगीन यूरोप का इतिहास तो अक्सर पढ़ा ही है कि कैसे मानवता का सड़क-संसद से लेकर चर्च तक में सरेआम चीथड़े चीथड़े किये जाते थे!

तो ऐसे में सनातन राजनीति के प्रकांड विद्वान चाणक्यi का अकाट्य दर्शन जेहन में स्वत: प्रस्फुटित हो उठता है कि “जिस देश की जैसी प्रजा होती है उसको राजा वैसा ही मिलता है,,,पर आज यदि संवेदनहीन सरकार सत्तासीन हो जाए तो लोकतंत्र में पदस्थ करने के भी प्रावधान है
अतीत से लेकर वर्तमान तक के राजनितिक सफर का मूल्यांकन कर दिल में पीड़ा जरूर रही कि क्या अब कभी भारतीय राजनीति के बंजर जमीन में जननायक पल्ल्वित नहीं होंगे?

आखिर नहीं होंगे तो क्यों? क्या शायद इसलिए कि हमने व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सार्वजनिक उच्चाकांक्षाओं की तिलांजलि दे डाली,
समुचे समाज के लोककल्याण के लिए आवंटित योजनाओं का एक संडास, दो कमरों के आवास, तनिक ठिका-पट्टा, शराब-साड़ी और हैंडपंप से समझौता कर डाला जा रहा है,,

तो ऐसे में गाज़ीपुर के सुदूरतम किसी गाँव में बैठकर टीवी पर डिबेट देखकर सत्ता पक्ष और विपक्ष को मत कोसिये क्योंकि ज़ब आप और हम अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ज़मीर बेंच सकते हैं तो संसद और विधानसभा में बैठा हमारा जनप्रतिनधि क्यों न अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए हाँथ मारे?
पर वर्तमान के इन्हीं हालात के कोख से निकले कुछ ऐसे भी आदर्श हैं जो राजनीति के विशुद्ध प्रतिमानों को पुनर्स्थापित करने में सहर्ष तत्पर हैं, पर हाँ उन्हें समझने के लिए ठहराव की जरूरत है, चिंतन की जरूरत है, नजदीक जाकर उनके दिलों के जज़्बात को समझने की जरूरत है,

एक तरफ हमने भारतीय राजनीति में जहां जनप्रतिनधियों को स्वार्थ के चरम बिंदु पर तांडव करते पाया, जहां वोट के नाम पर समाज-तोड़ राजनीति का विभीषक खेल खेलते देखा, जहां सत्ता में बने रहने के लिए सदैव छद्द्म भेष का सहारा लिया गया, वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा भी जन प्रतिनधि देखने को मिलता है जिसने मछली की आँख की भांति सदैव सिर्फ जन सेवा को ही अपना धर्म माना, ना कभी जाति की राजनीति, ना ही कभी किसी एक वर्ग विशेष को प्रश्रय, ना ही कभी गलत या अवांछनीय तत्वों की पैरवी(याद रहे गलत की पैरवी ही सच्चाई के लिए अग्निकुंड है) या इन सभी उपलब्धियों का समावेशित भाव यह कि सिर्फ सिद्धांत और विचारधारा की राजनीति करते पाया गया|

हो सकता है कि तनिक अलंकरण हो गया हो किन्तु मेरे वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष मूल्यांकन पर अलंकरण का प्रभाव .1°/. से ज्यादा नहीं हो सकता!

असल जन नायक वही होता है जो दो कदम आगे बढ़कर अपने आने वाली नस्लों के बारे में सोचे, पर हम वर्तमान में जीने के आदि हो चुके हैं हमारी नारजगी ट्रैन टिकट, बदली और ठिका-पट्टा को लेकर है,
पर यदि भविष्यउन्मुखी सोच होती तो गाज़ीपुर हवाईअड्डा शिलान्यास को सकारत्मक नजरिये से देखते!
हम देखते कि लोककल्याण के जो भविष्यउन्मुखी योजना है वह हिन्दुस्तान के पटल पर पूर्वांचल अत्याधुनिकता और भौतिक संसाधन सम्पन्नता का सैर कराने वाला है!एक प्रकरण है इतिहास लेखन के संदर्भ में कि, इतिहास अध्ययन का मूल मंत्र है कि यदि अतीत का सार्वभौमिक और वस्तुनिष्ठ अन्वेषण करना है तो उस मुद्दे से जुड़े समस्त कड़ियों का बारीकी से निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए, और दूसरी चीज किसी के बारे में जानने के लिए हम जिस तरह के नजरिया को विकसित करते हैं उसी प्रकार की जानकारी हमें हांसिल भी होती है अर्थात किसी को जानने से पहले स्वेक्षिक आंकलन को त्याग देना चाहिए अन्यथा जाति रूपी भ्रम हो या क्षेत्र रूपी भ्रम बरकरार ही रहता है

ज़ब मेडिकल कालेज और अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा गाज़ीपुर के धरा पर उतारने की बात चल रही हो तो उसके सार्वभौमिकता, प्रासंगिकता और उपयोगिता को समझना चाहिए! और यदि हम समझ नहीं पा रहे तो जाहिर है कि या तो मूल्यांकन में स्व प्रभावी हो रहा है या फिर मूल्यांकन का नजरिया बेहद संकुचित!आज विरले ही राजनीति में सार्वजनिक व्यक्तित्व देखने को मिलता है. कोई मांस-मदिरा में व्यस्त है तो कोई कोठी-बँगला और आगामी चुनाव हेतु जातिगत समीकरण में परेशान, पर वहीं कोई व्यक्ति जो दिन रात एक करके हमारी सेवा कर रहा है तो उस पर हम कभी जातिवाद का आरोप लगा देते हैं तो कभी क्षेत्रवाद का! और इधर हम भड़ांस भी निकालते हैं कि आखिर इन नेताओं को हो क्या गया है? ये सब तो सिर्फ समाज तोड़ने की बात और अपने बैंक-बैलेंस भरने की बात कर रहे हैं, अर्रे तो हम समाज जोड़ने और नैतिकता तथा सादगी के साथ राजनीति करने वाले को ही कहाँ बख्श रहे हैं, आखिर हम भी तो भूल ही जा रहे हैं कि किसी भी समाज में ज़ब विकास-कार्य प्रगति के पथ पर होता है तो उससे समाज का प्रत्येक वर्ग प्रभावित होता है!

मन व्यथित है, हतप्रध हूं, वेदना का उदगार ज्वालामुखी की भांति अपने चरम पर है जिसे घंटो रोका नहीं जा सकता, पर यहां एक सवाल के साथ अपने व्यथा को सिमटने की पेशकश है आप सभी से, एक ऐसा सवाल जो खुद स्वयं से करना है और जवाब भी खुद को देना है कि हमें आज कैसे जनप्रतिनिधियों की जरूरत है? क्या वाकई हम चाहते हैं कि स्वच्छ राजनीति हो? तो आखिर स्वच्छ राजनीति के लिए किस प्रकार के जनप्रतिनिधियों का चुनाव होना चाहिए?

अब एक आंकलन खुद से कि इन उपरोक्त प्रश्नों के आधार पर हम आदरणीय मनोज सिन्हा जी की स्थिति किस पायदान पर पाते हैं? क्या इन प्रश्नों का जवाब हमारे विकास पुरुष #मनोज_सिन्हा जी हैं? अगर हैं तो फिर सहयोग करना हमारा दायित्व भी है और वक्त की मांग भी!

पुनः चाणक्य की एक बात को दोहराना अपरिहार्य हो जाता है कि यदि अच्छे व्यक्ति की राजनीति में सहभागिता नहीं होगी तो अयोग्य हम पर शासन करने लगेंगे,
तो आज वक्त की नजाकत है जिसे पहचानना होगा ताकि वर्षों से पिछड़े और उपेक्षित पूर्वांचल को हिन्दुस्तान के मानचित्र पर टिमटिमाते हुए देखा जा सके,
सहृदय धन्यवाद!
सुरेश राय चुन्नी!

इलाहाबाद विश्वविद्यालय,
इलाहाबाद

मुझे भी कुछ कहना है,,,

आदरणीय मनोज सिन्हा जी आपसे नाराजगी है,रेल मंत्रालय आपके पास है आप चाहते तो पूरे ग़ाज़ीपुर को रेल में नॉकरी नहीं दे देते? पर आपने ऐसा नहीं किया, शायद आप भूल रहे हैं कि हम अभी भी 70-80 के दशक के राजनीतिक परिवेश में सांस ले रहे हैं, आज भी हम चुनाव को साड़ी, शराब और चंद रुपये तक सीमित कर रखे हैं या यूं कहा जाए यही सब चुनाव के एजेंडे हैं,

आप शायद इस चीज को भूल रहे हैं कि चुनाव में जीते हुए प्रत्याशी का साथ भी हम इसीलिए देते हैं ताकि कुछ व्यक्तिगत हित साधे जा सकें, सत्तासीन नेता से सम्बन्ध भी हम इसी लिए बनाते हैं ताकि एक दो नलका, संडास, आवास, मनरेगा मजदूरी या फिर जिस विभाग के मंत्री हैं उस विभाग के अध्यक्ष बनने का ख्वाब, या थोड़ा बहुत ठीके-पट्टे मिलने लगे, सिन्हा जी आपसे शिकायत है आपको इस उम्र में इतना भाग-दौड़ नहीं करना चाहिए, एक सहज उपाय है आज की राजनीतिक परिवेश में एक तुच्छ, मर्यादाहीन, असभ्य बर्बर बयानबाजी कर दीजिए आपको हम सर-आंखों पर उठा लेंगे, आप एक बार आइये न मजहबी चोला ओढ़कर फिर देखिए आप दिल्ली में बैठकर पूर्वांचल के दिल पर राज करेंगे! आपको पूरे हिन्दुस्तान को आत्मविश्वास और जोश से भरे कदमों से नापने की जरूरत नहीं, पता नहीं आप कैसे रेल राज्यमंत्री हैं कि अपने सम्बन्धियों का एक दिन पहले टिकट कन्फर्म नहीं करवाते, आखिर आपको रेल मंत्रालय दिया क्यों गया है?

आपको रेल मंत्रालय इसलिए नहीं दिया गया कि आप ग़ाज़ीपुर जैसे तमाम पिछड़े स्टेशनों को समय से 100 वर्ष आगे पहुंचा दें, हमें आपसे ये कत्तई उम्मीद नहीं थी कि आप टिकट कन्फर्म और नॉकरी के बजाय वर्षों से पिछड़े पूर्वांचल को देश के बड़े बड़े शहरों से जोड़ेंगे, आखिर ग़ाज़ीपुर से 20 km दूर से निकला व्यक्ति रोजगार के सिलसिले में इतना तो खलिहर है ही कि ट्रेन पकड़ने के नाम पर आराम से गाड़ी बदलकर बदलकर वाराणसी और मुगलसराय जैसे बड़े स्टेशनों से ट्रेन पकड़ ही लेंगे,,,और पैसे की कमी भी तो नहीं जो ट्रेन पकड़ने तक अतरिक्त किराए के रूप में वहन ना किया जा सके,,,आखिर बहुत किराया लगेगा ट्रेन पकड़ने में तो 100 रुपये बस न!

सर्जनात्मकता का पर्याय बन चुका है पूर्वांचल! पर हमारी समस्या ये है कि हम वर्तमान में जीते हैं, हमें भविष्य का कोई भान नहीं! हम भविष्य के बेहतर और बड़े लाभ को ठोकर मार देते हैं सिर्फ वर्तमान के क्षणिक सुख के लिए, सुनने में आ रहा है कि ग़ाज़ीपुर की आवाम नाराज़ है, कारण जानने का प्रयास किया तो पता चला कि नाराजगी की वजह है, टिकट कन्फर्म ना हो पाना, रेल विभाग में सिफारिश ना करना, दो भाइयों के बीच झगड़ा है तो किसी एक पक्ष का बचाव करते हुए एक को दबा देना, थाना-कचहरी पर जल्दी दबाव ना बनाना इत्यादि! पर जरा सार्वभौमिक मूल्यांकन किया जाए तो क्या यह दलील जायज है? क्या किसी परिवार को तोड़ने का काम जायज है और रेल में यदि सिफारिश करें तो क्या एक योग्य व्यक्ति का हक नहीं मारा जाएगा, आखिर हम युवा प्रतियोगी इसी बात की लड़ाई तो पिछले सरकार में लड़े की नॉकरी में धांधली हो रही है तो क्या अब प्रश्न चिन्ह लगाना जायज नहीं होगा?

हमें थोड़ा वर्तमान से ऊपर उठकर भविष्य के बारे में भी सोचना चाहिए, ग़ाज़ीपुर में मेडिकल कॉलेज खुलेगा तो हम चिकित्सकीय क्षेत्र में तो कुछ उपलब्धि हांसिल करेंगे ही साथ ही साथ एक व्यापक पैमाने पर रोजगार का भी सर्जन होगा, अगल-बगल बड़ी बड़ी दुकाने खुलेंगी|
अंतराष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम यदि बनता है तो शायद उसके लाभ से कोई अनजान नहीं, आज मनोज जी को विकाश पुरुष कहा जा रहा है तो आखिर क्यों? इसका जवाब खुद को देना है, आखिर इससे पहले विकास शब्द कभी ग़ाज़ीपुर के धरा पर व्यवहरित होते देखा गया?

सोचिये जब एक व्यक्ति लगातार ऊर्जावान बनकर रचनात्मक कार्य कर रहा है तो उसके साथ हमारा क्या रोल होना चाहिए, क्या नकारत्मक आलोचना करना जायज है अगर हां तो बेहतर विकल्प सुझाने की कृपा हो कि मनोज जी से बेहतर विकल्प कौन हो सकता है?

हम वर्तमान में किसी भी व्यक्ति या समाज का मूल्यांकन उसके अतीत के आधार पर करते हैं, और अब तक का जो मूल्यांकन है वह यही है कि मनोज जी the best हैं

एक बात और जब विकास होता है तो वह किसी विशेष जाति, धर्म या समुदाय के लिये नहीं उससे समाज का प्रत्येक वर्ग प्रभावित होता है,

मैं पेशे से विद्यार्थी हूँ, मेरा कार्य है स्वतन्त्र चिंतन और मूल्यांकन,

मैं मनोज जी से कभी नहीं मिला, वो भी हमें दूर दूर तक नहीं जानते,
और उनसे मेरा कोई काम भी नहीं पड़ने वाला, मेरा क्षेत्र दूसरा है,

हां मेरे मूल्यांकन का जो आधार है वह व्यक्तिगत लाभ नहीं वरन सार्वजनिक विकास, हमें थोड़ा अपना नजरिया बदलना होगा, व्यक्तिगत स्वार्थ के चश्में से परे पूर्वांचल के विकास और तरक्की के नजरिये से देखने पर लगेगा कि हमारा ग़ाज़ीपुर-पूर्वांचल संवर रहा है, हिन्दुस्तान के नक्शे पर अपना वजूद बना रहा है, बस इसी के नाते हम आवाम की भी यह जिम्मेदारी है कि हम उनके साथ कदम मिलाएं, अगर वो गलती करें तो उन्हें टोकें, रोकें भी और आलोचना भी करें, पर जब सही चल रहा हो तो सम्बल भी प्रदान करना चाहिए, किसी भी समाज का उत्थान और पतन समाज के प्रत्येक व्यक्ति परनिर्भर करता है,

आओ चलें दो कदम अपने राजनीतिक संरक्षक मनोज सिन्हा जी के साथ!

(अगर आप लोगों को लग रहा है कि मुल्यांकन सही है तो कृपया खूब share करें ताकि एक तो हमारे जन नायक का मनोबल उठे और दूसरा एक बेहतर राजनीतिक संस्कार का प्रस्फुटन हो जिसमें सिद्धांत की बात हो, विकास की बात हो, और अगर कहीं पर गलत हैं हमारे नेता जी तो भी प्रतिक्रिया करिये आप लोग ताकि उनको एहसास कराया जा सके कि आप इस जगह गलत हैं तो सुधार करिये )

हिन्दुस्तान के नक़्शे पर हमें गाज़ीपुर-पूर्वांचल की मरजाद/अस्तित्व चाहिए चाहे वह जैसे आये, आज तक पूर्वांचल उपेक्षित ही रहा,,,पर अब कुछ ज्यादे बेहतर स्थिति में है,,,, कदम मिलाना होगा!

©Suresh Rai Chunni